Hindi Love Poem

इत्मिनान से जी लूँ
लिख लूँ कुछ नगमें
जो ज़ज्बात से भरें हों
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
गढ़ लूँ कुछ नये आयाम
सतत बढूँ दीर्घ गूंज से
ले मैं रुख पर नकाब
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
स्मरण कर उन्मुक्त स्वर
स्वछन्द गगन में टहलूं
सहजभाव से स्मृतियों में
कुछ ख्यालों को छुला लूँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
महसूस कर लूँ एहसास
तेरे यहाँ आने का
बरस जाये बरखा
सावन भर आये और
तुझसे मिलन हो जाएँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना ह







जैसे प्रीत हो पहली-पहली
फाल्गुनी

तुम, एक कच्ची रेशम डोर,
तुम, एक झूमता सावन मोर

तुम, एक घटा ज्यों गर्मी में गदराई,
तुम, चांदनी रात, मेरे आंगन उतर आई

तुम, आकाश का गोरा-गोरा चांद,
तुम, नदी का ठंडा-ठंडा बांध,

तुम, धरा की गहरी-गहरी बांहें,
तुम, आम की मंजरी बिखरी राहें,

तुम, पहाड़ से उतरा नीला-सफेद झरना,
तुम, चांद-डोरी से बंधा मेरे सपनों का पलना,

तुम, जैसे नौतपा पर बरसी नादान बदली
तुम, जैसे सोलह साल की प्रीत हो पहली-पहली,

तुम, तपते-तपते खेत में झरती-झरती बूंदें,
तुम, लंबी-लंबी जुल्फों में रंगीन-रंगीन फुंदे,

तुम, सौंधी-सौंधी-सी मिट्टी में शीतल जल की धारा,
तुम, बुझे-बुझे-से द्वार पर खिल उठता उजियारा। 


 
सूखी हुई टहनी पर
टंगी
गीली ओंस बूंद की तरह,
टंगी है
मेरी उम्मीद की
थरथराती अश्रु-बूंद
तुम्हारे जवाब के इंतजार में,

धवल चांदनी गुजर गई
और ठिठक गई है भोर,
कांप रही है अब भी
मेरी आशा की डोर,

आदित्य-रश्मियों से
जगमगा उठी नाजुक ओंस बूंद,
लगा जैसे नाच उठा
लरजती आस का नीला मोर..

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