इत्मिनान से जी लूँ
लिख लूँ कुछ नगमें
जो ज़ज्बात से भरें हों
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
गढ़ लूँ कुछ नये आयाम
सतत बढूँ दीर्घ गूंज से
ले मैं रुख पर नकाब
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
स्मरण कर उन्मुक्त स्वर
स्वछन्द गगन में टहलूं
सहजभाव से स्मृतियों में
कुछ ख्यालों को छुला लूँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
महसूस कर लूँ एहसास
तेरे यहाँ आने का
बरस जाये बरखा
सावन भर आये और
तुझसे मिलन हो जाएँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना ह
तुम, एक कच्ची रेशम डोर,
तुम, एक झूमता सावन मोर
तुम, एक घटा ज्यों गर्मी में गदराई,
तुम, चांदनी रात, मेरे आंगन उतर आई
तुम, आकाश का गोरा-गोरा चांद,
तुम, नदी का ठंडा-ठंडा बांध,
तुम, धरा की गहरी-गहरी बांहें,
तुम, आम की मंजरी बिखरी राहें,
तुम, पहाड़ से उतरा नीला-सफेद झरना,
तुम, चांद-डोरी से बंधा मेरे सपनों का पलना,
तुम, जैसे नौतपा पर बरसी नादान बदली
तुम, जैसे सोलह साल की प्रीत हो पहली-पहली,
तुम, तपते-तपते खेत में झरती-झरती बूंदें,
तुम, लंबी-लंबी जुल्फों में रंगीन-रंगीन फुंदे,
तुम, सौंधी-सौंधी-सी मिट्टी में शीतल जल की धारा,
तुम, बुझे-बुझे-से द्वार पर खिल उठता उजियारा।
सूखी हुई टहनी पर
टंगी
गीली ओंस बूंद की तरह,
टंगी है
मेरी उम्मीद की
थरथराती अश्रु-बूंद
तुम्हारे जवाब के इंतजार में,
धवल चांदनी गुजर गई
और ठिठक गई है भोर,
कांप रही है अब भी
मेरी आशा की डोर,
आदित्य-रश्मियों से
जगमगा उठी नाजुक ओंस बूंद,
लगा जैसे नाच उठा
लरजती आस का नीला मोर..
लिख लूँ कुछ नगमें
जो ज़ज्बात से भरें हों
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
गढ़ लूँ कुछ नये आयाम
सतत बढूँ दीर्घ गूंज से
ले मैं रुख पर नकाब
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
स्मरण कर उन्मुक्त स्वर
स्वछन्द गगन में टहलूं
सहजभाव से स्मृतियों में
कुछ ख्यालों को छुला लूँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना है |
महसूस कर लूँ एहसास
तेरे यहाँ आने का
बरस जाये बरखा
सावन भर आये और
तुझसे मिलन हो जाएँ
फिर सोचूँगी की मुझे
अब क्या करना ह
जैसे प्रीत हो पहली-पहली
फाल्गुनी
तुम, एक झूमता सावन मोर
तुम, एक घटा ज्यों गर्मी में गदराई,
तुम, चांदनी रात, मेरे आंगन उतर आई
तुम, आकाश का गोरा-गोरा चांद,
तुम, नदी का ठंडा-ठंडा बांध,
तुम, धरा की गहरी-गहरी बांहें,
तुम, आम की मंजरी बिखरी राहें,
तुम, पहाड़ से उतरा नीला-सफेद झरना,
तुम, चांद-डोरी से बंधा मेरे सपनों का पलना,
तुम, जैसे नौतपा पर बरसी नादान बदली
तुम, जैसे सोलह साल की प्रीत हो पहली-पहली,
तुम, तपते-तपते खेत में झरती-झरती बूंदें,
तुम, लंबी-लंबी जुल्फों में रंगीन-रंगीन फुंदे,
तुम, सौंधी-सौंधी-सी मिट्टी में शीतल जल की धारा,
तुम, बुझे-बुझे-से द्वार पर खिल उठता उजियारा।
सूखी हुई टहनी पर
टंगी
गीली ओंस बूंद की तरह,
टंगी है
मेरी उम्मीद की
थरथराती अश्रु-बूंद
तुम्हारे जवाब के इंतजार में,
धवल चांदनी गुजर गई
और ठिठक गई है भोर,
कांप रही है अब भी
मेरी आशा की डोर,
आदित्य-रश्मियों से
जगमगा उठी नाजुक ओंस बूंद,
लगा जैसे नाच उठा
लरजती आस का नीला मोर..
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