Sandeep Dan's Poem

रौनक नहीं सजती लाख बेगाने चेहरों से
महफ़िल दोस्त, शराब और शबाब मांगती है।

सियारों की भीड़ जीत नही सकती जंग
रण- विजय की सेज़, लहू में उबाल मांगती है।

दो कदम साथ चलना ही नही दोस्ती की निशानी
वक़्त पड़े मौत से लड़ जाये, वो जजबात मांगती है।


मूंछो पे ताव देना ही नही अपने आन स्वाभिमान की पहचान
राजपूत की तलवार कई बार, अपनों का ही बलिदान मांगती है।

दो वक़्त की रोटी नही आसान मजदूर-किसान को
परिवार की लाचारी और बेबसी, जिस्म का माँस मांगती है।

जाने किस मजबूरी ने उसे कोठे पे बैठा दिया
पापन ही सही, वो दुनिया का त्रिस्कार नही प्यार मांगती है।

और अंत मैं कविता की धारा से हटके :)
यूँ अकेले तन्हा नही गुजर पायेगी ये मेरी जिंदगी
ये सुबह शाम हर घडी तेरा साथ मांगती है।

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