Dr. Kumar Vishwash2

तडपन, पीर, उदासी, आँसूं ,
बेचैनी, उपवास, अमावस,
अजब प्रीत का मौसम मन में पतझर है, 
नयनों में पावस, 
इस अलमस्त जुगलबंदी से बाहर, 
कुछ भी प्रीत नहीं है ,
ये सब सच है
गीत नहीं है !!!
लोग मिले कितने अनगाये,
कितने उलझ-उलझ सुलझाये ,
कितनी बार डराने पहुंचे , 
आखों तक कुछ काले साये ,
जो इन का युगबोध न समझे,
साथी होगा मीत नहीं है !
ये सब सच है
गीत नहीं है !!!
अपमानों कि सरस कहानी ,
जग भर को है याद ज़ुबानी 
और विजय के उद्घोषों पर
दुनिया की यूँ आनकानी ,
खुद से अलग लड़े युद्धों में जीत मिली, 
पर जीत नहीं है ,
ये सब सच है
गीत नहीं है !!!

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