Dr. Kumar Vishwas3

               ख़्वाब इतने तो दगाबाज़ न थे मेरे कभी ?
ख्व़ाब इतनी तो मेरी नीँद नहीं छलते थे ?
रात कि बात क्या इक दौर में ये ख़ानाबदोश 
दिन निकलते ही मेरे साथ-साथ चलते थे, 

मैं इन्हें जब भी पनाहों में जगह देता हुआ 
अपनी पलकों की मुडेरों पे सजा लेता था ,
पूरा मौसम इन्ही ख्वाबों की सुगंधों से सजा 
मेरे चटके हुए नग्मों का मज़ा लेता था ,

कुछ हवाओं के परिंदे इन्ही ख़्वाबों में लिपट 
चाँद के साथ मेरी छत पे आ के मिलते थे ,
ये आँधियों को दिखा कर मुराद
और ये आज की शब इनकी हिमाकत देखो 

इतनी मिन्नत पे भी ये एक पलक-भर ना रुके, 
इनकी औकात कहाँ ?ये है मुकद्दर का फ़रेब 
इतनी जिल्लत कि मेरे इश्क़ का दस्तार झुके, 
ये भी दिन देखने थे आज तुम्हारे बल पर 

ख़्वाब कि मुर्दा रियाया के भी यूँ पर निकले 
तुम्हारी बातें, निगह, वादे तो तुम जैसे थे 
तुम्हारे ख्वाब भी तुम जैसे ही शातिर निकले .
लाख भीगे ज़मीन का आँचल 
लाख किरनों कि आखँ गीली हों 
चाहे रोये सुबह कि तन्हाई या
 कि शामें उदास पीली हों 

तुम को क्या काम ये पता रख्खो 
 ऐसे मौसम में हम कहाँ पर हैं ?
तुम को ये वक़्त कि इज़ाज़त कब 
किस के सीने में गम कहाँ पर हैं?

ठीक भी है कि तुम खुदा हो मेरे 
और बस एक का खुदा कब है 
मेरे होने ,ना होने का मतलब 
 आप के वास्ते जुदा कब है .........



 another poem


बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन ||1||


जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल एक ऐसा इकतारा है,
जो हमको भी प्यारा है और, जो तुमको भी प्यारा है.
झूम रही है सारी दुनिया, जबकि हमारे गीतों पर,
तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या अहसान तुम्हारा है ||2||



जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उमर मगर ,
बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ||3||


बहुत टूटा बहुत बिखरा थपेडे सह नही पाया
हवाऒं के इशारों पर मगर मै बह नही पाया
रहा है अनसुना और अनकहा ही प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नही पायी कभी मै कह नही पाया ||4||


तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ ||5||


पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है
हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या ||6||


समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नही सकता
ये आँसू प्यार का मोती है इसको खो नही सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नही पाया वो तेरा हो नही सकता ||7||


पुकारे आँख में चढ़कर तो खू को खू समझता है,
अँधेरा किसको को कहते हैं ये बस जुगनू समझता है,
हमे तो चाँद तारों में भी तेरा रूप दिखता है,
मोहब्बत में नुमाइश को अदाएं तू समझता है ||8||


गिरेबां चाक करना क्या है , सीना और मुश्किल है,
हर एक पल मुश्कुराकर अश्क पीना और मुश्किल है
हमारी बदनसीबी ने हमे इतना सिखाया है,
किसी के इश्क में मरने से जीना और मुश्किल है ||9||


मेरा अपना तजुर्बा है तुम्हें बतला रहा हूँ मैं
कोई लब छू गया था तब अभी तक गा रहा हूँ मैं
फिराके यार में कैसे जिया जाये बिना तड़फे
जो मैं खुद ही नहीं समझा वही समझा रहा हूँ मैं ||10||


किसी पत्थर में मूरत है कोई पत्थर की मूरत है
लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी ख़ूबसूरत है
ज़माना अपनी समझे पर मुझे अपनी खबर ये है
तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है. ||11||
 

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